क्या असल में कुछ भी कभी पूरा होता है?
बड़ी आसानी से ये कह कर मैं वहाँ से चला आया कि, "बात पूरी हुई, अब मैं चलता हूँ।" जबकि लौटते वक़्त मेरे पास इतना कुछ धीरे-धीरे कर इकट्ठा होते गया कि घर पहुँच कर मुझे लगा कि हमें फिर मिलना होगा। जो हमें अंत लग रहा था, दरअसल वो एक बहुत बड़े का छोटा सा अंश मात्र था।
पर फिर इस तरह तो कुछ भी कभी पूरा हो नहीं पाएगा, या कभी हो जाए, तो क्या उसके बाद किसी नए सवाल-जवाब की कोई गुंजाइश नहीं होगी? अब मैं हर उस घटना को शक की नज़र से देखने लगा, जिसे मैं संपूर्ण समझने लगा था। मेरा ये शक तब और गहरा होता गया, जब तुम मुझसे फिर मिलने को तैयार हो गई।
मैं कुछ कहूँ उससे पहले ही तुम किसी बात का अधूरा हिस्सा पूरा करने की बात कहने लगीं। असल में हम धीरे-धीरे कर अधूरी बातों को छोड़ देते हैं, ताकि वो पूरी लगने लगें। अब जब तक वहाँ बहुत दिनों तक कोई हलचल नहीं होती, उसे पूरा माना जाता रहता है। मुझे लगता है कि किसी दिन कोई हवा चलेगी और ये सब अधूरी बातें एक साथ बोल पड़ेंगी।
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