मुड़कर देख लेना
मैं हमेशा वो आख़िरी 'बाय' बोलने के कुछ देर बाद पीछे मुड़कर देख लेता हूँ। ये आदत शायद मुझे तुम्हीं से मिली थी। अब कब, क्यों और कैसे — यह तो मुझे ठीक तरह से पता नहीं। बहुत सोचने पर जो उत्तर मिला, वो ये था: कि तुम हमेशा 'बाय' बोलने के बाद एक बार मुड़ कर देख लेती थीं।
ऐसे में कई बार हमारी आँखें टकरा जाती थीं। हम दोनों के मुड़ने की टाइमिंग अलग-अलग होती थी, इस क्रम में मैं थोड़ा सा पहले होता था, तो मैं अक्सर तुम्हें मुड़ते हुए देखता था। मुझे तुम्हारे मुड़ने की अदा पसंद थी, और वो आँखों से यह कहने की कोशिश करना कि 'मुझे पता था कि हम आख़िरी बार के बाद ऐसे फिर मिलेंगे।'
ये आदत तुम से शुरू हुई और बस रह गई। इन दिनों मैं अपनी यात्राओं में भी ऐसे ही आते-जाते पीछे मुड़कर देख लेता हूँ। इस प्रक्रिया में कई बार मुझे कुछ वैसा भी दिख जाता है जो लगातार उस तरफ़ देखने से भी नहीं दिखता है। और एक उम्मीद भी कि क्या पता किसी नदी या पहाड़ को मेरे मुड़ने की अदा पसंद आ जाए
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