अगली मुलाकात

हमें न हर मुलाकात में अगली मुलाकात के लिए कुछ छोड़ देना चाहिए। इसीलिए मैं उस शाम बहुत कम बोलना चाहता था, मुझे यह डर था कि कहीं सब कुछ ख़त्म हो गया तो?

मुझे लगता है लिख देना काफ़ी आसान होता है। लिखे हुए में हम कुछ हद तक आज़ाद होते हैं। अब तुम जब सामने थी तो मैं चुप रहा, मैंने सवालों की एक लिस्ट बना रखी थी। वैसे भी मैं कभी कहाँ कुछ बोल पाता था तुम्हारे साथ, मैं बस तुम्हें सुन लेना चाहता था।

मैं ये सब सोच ही रहा था कि इसी उधेड़बुन में टेबल पर चाय आ गई, और इस बार तुमने चाय के लिए मना नहीं किया। पर क्या ये छोटी-छोटी बातें हमारी दूरी को कम कर सकती थीं? जैसे तुम्हारा मेरे साथ चाय पी लेना, मेरा तुम्हारे सामने थोड़ा-बहुत बोल लेना, हमारा कभी-कभी मिल लेना... या फिर मैं फिर से कुछ ज़्यादा ही सोच गया और तब तक चाय भी ख़त्म हो गई।

अब एक कप चाय में शायद इतना ही सोचा जा सकता था, सो सोचा।

मैं अब दिमाग़ और ज़ुबान दोनों जगह से चुप था और तुम्हारे चेहरे पर एक बदली हुई मुस्कान देख रहा था। यह तुम्हारी मुस्कुराहट कब बदल गई यह समझ ही नहीं आया। मुझे याद है जब पहली बार ऐसे बैठे थे तो तुम आँखों और होंठों, दोनों से क्या ख़ूब मुस्कुराई थी। पर उस दिन जैसे तुम किसी फ़्लाइट अटेंडेंट सी मुस्कुराई—जैसे कि ये कोई काम था जो तुम्हें करना था। 'नहीं किया तो पता नहीं लोग क्या सोच लेंगे।'

तुमने मेरी चुप्पी तोड़ने के लिए कहा भी तो क्या: "अब चलें?"

क्या तुम मेरे साथ चुप नहीं रह सकती थी? क्या हम कुछ देर बिना बातों के नहीं रह सकते थे? मैंने इस बार मन से वो 'अगली मुलाकात' का ख़्याल निकाल दिया और कहा, "हाँ, अब चलना चाहिए।" इस बार मैंने अपने से 'फिर मिलेंगे' वाली बात नहीं की, हाँ बस इतना सोचा कि अगर हम कभी किसी मोड़ पर टकरा गए तो वह कैसे मुस्कुराएगी?


Comments

Popular Posts